मुकेश वैष्णव/दिव्यांग जगत/अजमेर
अजमेर। सहारा इंडिया समूह में अपनी खून-पसीने की कमाई फंसा चुके सैकड़ों निवेशक खुद को ठगे-से महसूस कर रहे हैं। ना जमा राशि मिल पा रही है और ना ही ब्याज। सोचा तो यह था कि कुछ राशि जोड़कर जमा कराएंगे, तो भविष्य में काम आएगी, लेकिन हुआ उल्टा। सहारा इंडिया ने निवेशकों से धड़ाधड़ धन तो जमा करवाया, लेकिन जब लौटाने की बारी आई, तो खुद ठिकाने लग गई। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रबंधन की गलत नीतियों के कारण कंपनी का भट्टा बैठ गया है, तो इसमें छोटे-छोटे निवेशकों का क्या कसूर है? क्या उन्होंने अपना और परिवार का भविष्य सुरक्षित करने की सोच के साथ निवेश कर गुनाह कर दिया था? जाहिर-सी बात है, जब गाढ़ी कमाई उलझ जाए, तो फिर निवेशकों का गुस्सा फूटना भी लाजिमी है। अजमेर कलेक्ट्रेट पर निवेशकों द्वारा किया गया प्रदर्शन इसी गुस्से का परिणाम है। नागरिक फरियाद के लिए शासन-प्रशासन के पास नहीं जाएंगे, तो कहां जाएंगे। ऐसे में शासन-प्रशासन का दायित्व बनता है कि वह अपने नागरिकों के हितों की हिफाजत करे।
यह हैं प्रमुख तथ्य
निवेशकों की ओर से जिला प्रषासन को सौंपे गए ज्ञापन में जो तथ्य दिए गए हैं, उनके अनुसार भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के अध्यक्ष एवं केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक को संयुक्त परिवाद प्रेषित कर ग्राम गगवाना स्थित सहारा समूह की 97.17 एकड़ भूमि के निस्तारण में हुए बड़े वित्तीय घोटाले की आपराधिक जांच कराने और निवेशकों का संपूर्ण भुगतान मय ब्याज दिलवाने की मांग की गई है। ज्ञापन में कहा गया है कि सहारा इंडिया समूह द्वारा देशभर के करोड़ों निवेशकों के धन से जयपुर-अजमेर राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप ग्राम गगवाना में 97.17 एकड़ भूमि आवासीय टाउनशिप विकसित करने के उद्देश्य से क्रय की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के क्रम में इस भूमि को वर्ष 2016 में सेबी के माध्यम से निस्तारित किया गया था। सहारा समूह द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पेश आधिकारिक सूची में इस भूमि का मूल्यांकन 136.50 करोड़ रूपए स्वीकार किया गया था तथा वर्तमान डीएलसी व बाजार दर के अनुसार यह 100 करोड़ रूपए से अधिक की है। ज्ञापन में कहा गया है कि नियमों और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट अधिदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए इसे मात्र 26.51 करोड़ रूपए (मूल्यांकन का महज 19 प्रतिशत) में एक फर्म के पक्ष में औने-पौने दाम पर निस्तारित कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना
ज्ञापन के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश था कि किसी भी परिसंपत्ति का विक्रय उसके वास्तविक बाजार मूल्य के 90 प्रतिषत से कम पर नहीं किया जा सकता, ताकि डिस्ट्रेस सेल न हो और निवेशकों को अधिकतम प्रतिफल मिले, जबकि यह संपत्ति कम दाम पर बेचा जाना सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट अवमानना है। कोर्ट स्पष्ट निर्देश दिए थे कि परिसंपत्ति बिक्री की राशि से पीड़ितों को 15 प्रतिषत वार्षिक ब्याज सहित भुगतान किया जाए। वर्ष 2016 में संपत्ति बिकने के 10 वर्ष बीत जाने के बाद भी आज तक पीड़ितों को उनकी मूल पूंजी तक नहीं लौटाई गई है।
निवेशकों की यह हैं प्रमुख मांगें
परिसंपत्ति के कृत्रिम अवमूल्यन, वित्तीय संव्यवहारों एवं मनी लॉन्ड्रिंग के संदेह पर सीबीआई की आर्थिक अपराध शाखा तथा सेबी से निष्पक्ष जांच कराई जाए। गगवाना भूमि के विक्रय से प्राप्त राशि और रिफंड खाते से सभी पीड़ित निवेशकों को 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित उनकी पूरी राशि अविलंब बैंक खातों में जारी की जाए। संपूर्ण अंतरण प्रक्रिया के शून्यप्रायः व संदेहास्पद होने के कारण राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 के तहत क्रेता फर्म के पक्ष में नामांतरण खोलने पर पूर्ण रोक लगाई जाए और मौके पर यथास्थिति रखी जाए। राजस्थान स्टाम्प अधिनियम, 1998 की धारा 47-ए के तहत जिला कलक्टर (मुद्रांक) द्वारा कार्रवाई कर राज्य को हुए करोड़ों के राजस्व नुकसान की वसूली मय पैनल्टी की जाए।