शहर में दम तोड़ रही बंगाली समुदाय की दुर्गा पूजा की परंपरा
शहर में बन्द हो गयी बंगाली समुदाय की दुर्गा पूजा
अब नही सुनाई देगी ढाकी की आवाज, नही दिखेगी घुरुचि नृत्य
दुर्गा पूजा के समय मां दुर्गा की प्रतिमा के सामने बंगाली समुदाय द्वारा किया जाने वाला घुरुचि नृत्य अब संभवतः नही दिखेगा। नृत्य के दौरान ढोलक की तरह बजाया जाने वाला वाद्ययंत्र ढाकी की ध्वनि अब नही सुनाई देगी। बंगाली महिलाओं द्वारा पूजा के दरम्यान मुंह से निकाला जाने वाली विशेष शंख की आवाज उल्लुल्लु अब नही सुनाई देगी। माता के विसर्जन के दौरान रंग अबीर और गुलाल जैसा शमां अब शायद नही दिखाई देगा। शहर के अंदर 42 सालों से चला आ रहा बंगाली समुदाय द्वारा दुर्गा पूजा की परंपरा अब बंद हो चुकी है। विगत दो वर्षों से शहर के आईएमए हॉल में आयोजित होने वाली दुर्गा पूजा पिछले साल से बंद हो गयी है। पिछले साल तो कोरोना के कारण यह पूजा नही हो सकी। लेकिन इस वर्ष कार्यकर्ता या पूजा संचालित करने वाले लोगों के अभाव में यह पूजा बन्द हो गयी।
शहर के आईएमए हॉल में पिछले लगभग 42 वर्षों से बंगाली समुदाय द्वारा दुर्गा पूजा अपने बंगाल के परम्परा के अनुसार की जा रही थी। पूजा समिति के माणिक सेन गुप्ता बताते है कि 1974-75 के आसपास डॉ. पी गुप्ता, डॉ. एमएन राय, पैथोलोजिस्ट डॉ. मल्लिक आदि ने बंगाली दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। बाद में मिहिर दास गुप्ता, विश्वनाथ घोष, शायमल घोष, खुदीराम बोस, लखन घोष आदि ने मिलकर पूजा की परंपरा को बनाये रखा। तब से लेकर पिछले साल तक यह पूजा अनवरत चलती रही। लेकिन इस वर्ष संस्था के सचिव और सबसे समर्पित कार्यकर्ता जो कि संस्था के सचिव थे खुदीराम बोस अपना सब कुछ बेच कर बंगाल अपने गांव चले गए। बाकी लोग या तो काफी बूढ़े हो गए या अस्वस्थ चल रहे है। जिस कारण इस वर्ष पूजा करने की जिम्मेवारी किसी ने नही ली। फलतः इस वर्ष दुर्गा पूजा नही मनाई जा सकी। संस्था के विश्वनाथ घोष ने काफी भारी मन से बताया कि मैं अब अस्वस्थ हूँ चाह कर भी पूजा नही कर पा रहा। कोई नया जेनरेशन पूजा करने आगे नही आ रहा। पूजा बन्द होने का काफी अफसोस हो रहा। वहीं मणिक सेन गुप्ता ने बताया कि हमारा एक्टिव कार्यकर्ता खुदीराम के जाने से हम निःसहाय हो गए वो अकेले सब कर लेता था। अब पता नही आगे क्या होगा। वहीं इस पूजा में लगातार शामिल हो रही शिक्षिका हिना बोस ने कहा कि यह पर्व हम बंगालियों के लिए एक कुम्भ जैसा था। वर्ष में एक बार हम सभी मिलते थे एक दूसरे को जानते थे। सप्तमी, अष्टमी और नवमी तीन दिन पूरा बंगाली समुदाय के साथ साथ अन्य स्थानीय लोग मिलजुल कर खिचड़ी का प्रसाद खाते थे। पर अब इस बात का दुख है कि यह पूजा बन्द हो गई। सभी युवा हमारे बच्चे या तो पढ़ने बाहर चले गए या जॉब में चले गए। जो है वो अब आगे नही आ पा रहे। इस बात का दुख है कि एक परम्परा दम तोड़ रही है।