आदर्श विधा मन्दिर पीपलाज द्बारा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मनाई जयंती
मुकेश वैष्णव/दिव्यांग जगत/अजमेर
अजमेर । आदर्श विद्या मंदिर पीपलाज ( ब्यावर ) द्वारा महाराणा प्रताप कॉलोनी पीपलाज एवं रीको एरिया पीपलाज में पथ संचलन निकाला गया । जिसमें विद्यालय के सभी भैया बहनों ने भाग लिया । पथ संचलन वंदे मातरम के उद्घोष के साथ प्रारंभ हुआ और भारत माता की जय घोष के साथ समाप्त हुआ । संचलन के उपरांत सुभाष चंद्र बोस के जीवनी और राष्ट्र को लेकर सामूहिक कार्यक्रम का आयोजन संपन्न हुआ । जिसमें प्रधानाचार्य तगतसिंह दांता ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नेताजी का जन्म 23 जनवरी 1897 में हुआ था, उन्होंने सर्वप्रथम भारतीय सशस्त्र बल की स्थापना की थी जिसका नाम *आजाद हिंद फौज रखा गया था । उनके *तुम मुझे खून दो मैं, तुम्हें आजादी दूँगा* के नारे से भारतीयों के दिलों में देशभक्ति की भावना और बलवान होती थी । आज भी उनके इस नारे से सभी को प्रेरणा मिलती है । नेताजी का जन्म ओडिशा में हुआ था वो ब्रिलिएंट स्टूडेंट थे । स्कूल और यूनिवर्सिटी दोनों में हमेशा उनकी टॉप रैंक आती थी। 1918 में उन्होंने फिलॉस्फी में ग्रेजुएशन फर्स्ट क्लास में पूरी की। 1920 में उन्होंने सिविल सर्विस परीक्षा इंग्लैंड में पास की थी । 1920 और 1930 में वो इंडियन नेशनल कांग्रेस के युवा और गर्म दल नेताओं में गिने जाने लगे। इसके बाद 1938 और 1939 में वो इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने । 1921 से 1941 के दौरान वो पूर्ण स्वराज के लिए कई बार जेल भी गए थे । उनका मानना था कि अहिंसा के जरिए स्वतंत्रता नहीं पाई जा सकती । दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने सोवियत संघ, नाजी जर्मनी, जापान जैसे देशों की यात्रा की और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सहयोग मांगा । इसके बाद जापान में उन्होंने आजाद हिंद फौज की स्थापना की प्रारंभ में इस फौज में वे लोग शामिल किए गए, जो जापान की ओर से बंदी बना लिए गए थे । बाद में इस फौज में बर्मा और मलाया में स्थित भारतीय स्वयंसेवक भी भर्ती किए गए । साथ ही इसमें देश के बाहर रह रहे लोग भी इस सेना में शामिल हो गए । उन्होंने आजाद हिंद रेडियो स्टेशन जर्मनी में शुरू किया और पूर्वी एशिया में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया। सुभाष चंद्र बोस मानते थे कि भगवत गीता उनके लिए प्रेरणा का मुख्य जरिया थी। जिन दिनों सुभाषचंद्र बोस सिंगापुर में थे, वहीं उनकी आज़ाद हिन्द फौज भी थी । सुभाषचंद्र बोस को उनके जन्म दिन पर चाँदी के सिक्कों, चाँदी के फूल-दानों, चाँदी के बर्तनों, सोने-चाँदी के ज़ेवरों और मूर्तियों से तोला जाना था ताँकि आज़ाद हिन्द फौज के लिए अस्त्र-शस्त्र खरीदे जा सके । सुभाषचंद्र बोस दोपहर में आए और तराजू के एक पलड़े में बैठ गए । सिंगापुर के हिन्दुस्तानी समाज के लोगों ने दूसरे पलड़े में सोने-चाँदी के ज़ेवर, सिक्के, बर्तन आदि रख दिये । लेकिन वह पलड़ा ऊपर ही उठा रहा. तभी एक गुजराती बूढ़ी माँ आई, बहुत वर्षों से उसने पैसे बचाकर सोने की पाँच ईंटें ले रखी थीं । उस बूढ़ी माँ ने वो पाँचों ईंटें उस उठे हुए पलड़े पर रख दीं । इसी बीच एक युवती दौड़ कर आई और उसने सिन्दूर लगा सुहाग-चिह्न भी पलड़े में रख दिया और साथ ही आँसू भरी आँखें लिए सुभाषचंद्र बोस को प्रणाम भी किया। उसके पति अंग्रेज़ों से लड़ते हुए शहीद हो गये थे।
तराजू का वह पलड़ा अभी भी थोड़ा ऊपर ही रहा , तभी एक बूढ़ी माँ आई, जिसके हाथ में सोने के फ्रेम में मढ़ा हुआ उसके बेटे का चित्र था । उसके बेटे को अंग्रेज़ों ने फाँसी दे दी थी। सोने के फ्रेम वाला वह चित्र उसने ज़मीन पर पटक कर तोड़ दिया. सोने का फ्रेम उसने तराजू पर रख दिया और चित्र अपने पास रख लिया. अब तराजू के दोनों पलड़े बराबर हो गये थे । सुभाषचंद्र बोस ने जब उस बूढ़ी माँ के बेटे के शहीद होने की बात सुनी तो उठकर खड़े हो गये और टोपी उतार कर उस माँ का अभिवादन किया। वह बूढ़ी माँ बोली – मेरा एक ही बेटा था, जिसे अंग्रेज़ों ने फाँसी चढ़ा दिया था, काश! मेरा दूसरा बेटा भी होता आज मैं उसे भी आप को सौंप देती ।
सुभाषचंद्र बोस ने उस बूढ़ी माँ के पाँव छू कर कहा – धन्य हो माँ! तुम्हारे बेटे का बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा, मैं भी तो तुम्हारा बेटा हूँ. ऐसे थे सुभाष चंद्र बोस । जिनके प्रति समाज का इतना समर्पण था और वह स्वयं देश के प्रति पूर्ण समर्पित थे ।
आजादी के अमृत महोत्सव पर दिल्ली के इंडिया गेट पर सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित करना समूचे देश के लिए गौरव का विषय है ।
वरिष्ठ अध्यापक नरेंद्र कुमार शर्मा ने आए हुए अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए कल्याण मंत्र के पश्चात कार्यक्रम समाप्त किया ।