सांसद भागीरथ चौधरी ने दवाईयों के वास्तविक एवं अंकित मूल्य में अत्यधिक अन्तर का मामला लोकसभा में उठाया
कानून बनाकर इसे नियंत्रित करने की रखी मांग
मुकेश वैष्णव/दिव्यांग जगत/अजमेर
अजमेर । लोकसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान सांसद भागीरथ चौधरी ने शून्यकाल के तहत अविलम्बनिय लोक महत्व के बिन्दू पर चर्चा के दौरान दवाईयों के एमआरपी एवं वास्तविक मूल्य में अन्तर का मामला उठाया। सांसद ने दवा कम्पनियों द्वारा दवाईयों पर अंकित खुदरा मूल्य के वास्तविक और एमआरपी में अन्तर के कारण आमजन को भारी नुकसान उठाना पडता है । इस सम्बन्ध में लोकसभा में अपने वक्तव्य में कहा कि केन्द्र सरकार का ध्यान देश की दवा कंपनियों के द्वारा उनके उत्पाद पर अंकित अधिकतम खुदरा मूल्य की ओर आकृष्ट करवाना चाहता हूं , कि वर्तमान में विभिन्न दवां कम्पनियां अपने उत्पाद से कही अधिक (कही कही तो मूल्य वास्तविक से 10 से 100 गुना) मूल्य अंकित करती है। जिसका सीधा-सीधा लाभ दवा विक्रेता को ही मिलता है। किंतु आम जनता को इसका कोई लाभ नहीं मिल पाता। तथा मूल्य न चुकाने की स्थिति में कई बार उसे अपने परिजनों के जीवन से भी हाथ धोना पड़ जाता है। इस प्रकार से दवा कंपनियों द्वारा सीधा लाभ दवा विक्रेताओं को पहुंचाया जा रहा है। वो भी मनमाने तरीके से। प्रायः देखा गया हैं कि कई जीवन रक्षक दवाओं की कीमत उसकी वास्तविक कीमत से 100 से 1000 गुना तक होती है। जो सामान्य परिवार को पहुंच से कही अधिक होती है और जिसका लाभ प्राइवेट अस्पताल व दवा विक्रेता उठाते है।
सांसद चौधरी ने लोकसभा में सभापति से आग्रह किया कि ऐसा कोई प्रावधान या बिल संसद में लाया जाए जिससे इन दवा कंपनियों पर अधिकतम खुदरा मूल्य अंकित करने की एक निर्धारित सीमा तय हो सकें। और उससे ज्यादा अंकित करने पर कड़ा प्रतिबंध हो तथा दंड का प्रावधान भी हो सांसद ने आशा व्यक्त कि की केन्द्र सरकार इस सन्दर्भ में शीघ्र ही राष्ट्र व आमजन के हित में समुचित कार्यवाही कर राहत प्रदान करायेंगी।