नवरात्रि में कन्या रूप में साक्षात् मां दुर्गा ही घर भोजन के लिए आती हैं.
दिव्यांग जगत/भूपेन्द्र सिंह पंँवार
नवरात्रि में कन्या पूजन व भोजन का विशेष महत्व है. जो व्रत के पारण के अनुसार अष्टमी या नवमी तिथि को किया जाता है. पौराणिक कथा व मान्यताओं के अनुसार कन्या के रूप में इस दिन साक्षात् मां दुर्गा ही घर भोजन के लिए आती हैं. ऐसे में व्रत पारण में पूरी भक्ति व श्रद्धा के साथ कुमारियों का पूजन कर उनको भोजन करावा जाता है इस संबंध में पंडित श्रीधर की एक पौराणिक कथा भी है,भोजन करने आई मां वैष्णो देवी पंडित रामचंद्र जोशी के अनुसार, कन्या पूजन को लेकर यूं तो अलग-अलग मान्यताएं व पौराणिक कथाएं हैं, लेकिन इनमें भक्त श्रीधर की कथा सबसे प्रसिद्ध है, जिसके अनुसार संतानहीन पंडित श्रीधर ने एक दिन कुमारी कन्याओं को भोजन पर निमंत्रित किया था. जब वह कन्याओं को भोजन करवा रहा था तो उनमें मां वैष्णो देवी भी कन्या के रूप में आकर बैठ गईं जो श्रीधर के श्रद्धाभाव से करवाए गए भोजन से काफी प्रसन्न हुईं. इसके बाद मां ने श्रीधर से पूरे गांव के लिए भंडारा करने को कहा की एक सफल भंडारे के बाद श्रीधर के घर कन्या का जन्म हुआ, जिसकी वजह से ही नवरात्रि में व्रत पारण के दिन कन्या पूजन व भोजन का विधान बना उम्र के अनुसार अलग-अलग रूप में कुमारी कन्याओं का उम्र के अनुसार अलग-अलग रूप माना गया है. पंडित जोशी के अनुसार दो वर्ष की कन्या दरिद्रभंजन यानि दुख दूर करने वाली होती है. तीन वर्ष की कन्या धन- धान्य देने वाली त्रिमूर्ति, चार वर्ष की कन्या कल्याण करने वाली कल्याणी, पांच वर्ष की कन्या रोग मुक्त करने वाली कल्याणी, छह वर्ष की कन्या विजय, राजयोग व विद्या देन वाली कालिका, सात वर्ष की कन्या ऐश्वर्य देने वाली चंडिका, आठ वर्ष की कन्या बुद्धि प्रदान करने वाली शाम्भवी, नौ वर्ष की कन्या शत्रु नाश कर सम्पूर्ण कल्याण करने वाली मां दुर्गा तथा दस वर्ष की कन्या सभी मनोरथ पूरा करने वाली सुभद्रा कहलाती है, इसलिए कन्या पूजन में 2 से 10 वर्ष की कुमारी कन्याओं को निमंत्रित कर पूजन किया जाता है।सप्तमी से नवमी तक व्रत पारण के अनुसार 2 से 10 वर्ष की 9 कन्याओं को घर में आमंत्रित करते हैं– कन्याओं के आने पर पुष्पवर्षा व मां दुर्गा के 9 रूपों के जयकारों के साथ उनका स्वागत करें. घर में प्रवेश होने पर उन्हें लकड़ी के पाट या कुश के आसन पर बैठाकर उनके पैरों को दूध या पानी से धोकर उनमें महावार लगाए. फिर उनके माथे पर कुमकुम या रोली का तिलक लगाकर श्रद्धापूर्वक पूजन व आरती करें.– इसके बाद सभी कन्याओं को आसन पर बिठाकर भोजन परोसें. साथ में एक बच्चे को भी भोजन करवाएं.– भोजन के बाद कुमारियों को दक्षिणा के साथ श्रद्धा व सामर्थ्य के हिसाब से उपहार दें। अरांँई कस्बे के आस पास में बने दुर्गा माँ के मन्दिरों के दर्शन कर के माँ का आशीर्वाद लिया जाता हैं। क्षेत्र में नवरात्रा स्थापना से लेकर रामनवमी तक मां दुर्गा की 9 दिन तक उपासना कर गांव की भक्तजन छोटी-छोटी कन्याओं को माता के स्वरूप मानकर उनकी पूजा कर उन्हें भोजन करवाकर श्रद्धा अनुसार दक्षिणा देखकर आशीर्वाद प्राप्त किया 9 दिन के व्रत को संपूर्ण सफलता पूर्वक उसके के लिए नव दुर्गा रूपी नौ कन्याओं का पूजन किया जाता था घर में सुख समृद्धि हर तरीके से परिपूर्ण होने का आशीर्वाद से पूर्ण विधि-विधान से इस कार्यक्रम को किया जाता है 9 दिन पश्चात दसवे दिन विजयदशमी के रूप में दसवे दिन विजयदशमी के रूप में दशहरा का आयोजन किया जाता है जिसमें भगवान श्री राम के द्वारा असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक मानते हुए रावण का वध करते हुए माता सीता को वापस अपने अयोध्या नगरी लेकर आये थे।