पति पत्नी ने एक साथ लिया संथारा पति का देवलोक गमन,खुशी का माहौल
जसोल: बुजुर्ग दंपती ने लिया था साथ संथारा, 19 दिन बाद बुजुर्ग पति का हुआ देवलोक गमन
दिव्यांग जगत न्यूज़ एजेंसी
बाडमेर – बाड़मेर जिले के छोटे से कस्बे जसोल में पहली बार देह-त्याग का उत्सव शुरू हो चुका है। पति के देहांत के बाद पत्नी भी पार्थिव शरीर के पास बैठ गई और णमोकार मंत्र का जाप शुरू कर दिया है। दंपती ने साथ में संथारा ग्रहण किया था और इच्छा थी कि दोनों साथ में देह त्यागे। हालांकि शनिवार सुबह 5 बजे 83 साल के पुखराज संकलेचा ने देह त्याग दी है।
दरअसल, मोक्ष प्राप्ति के लिए संथारा लेने का निर्णय लिया था, जिसके बाद उसकी पत्नी ने भी उनके साथ में संथारा लेने की इच्छा जताकर बुजुर्ग दंपति ने स्वेच्छा से देह त्यागने का फैसला किया है। जैन समाज में इसे ‘संथारा’ कहा जाता है। यह स्वेच्छा से देह त्यागने की परंपरा है। जैन धर्म में इसे जीवन की अंतिम साधना माना जाता है। बुजुर्ग पुखराज जैन ने संथारा लेने के 19 दिन बाद देह त्याग दिया और उसके बाद से ही लगातार भजन कीर्तन और मंत्रोचार का दौर जारी है। वहीं दोपहर के बाद पूरे गाजे-बाजे ढोल नगाड़ों के साथ उनकी अंतिम बैकुंठ यात्रा जसोल निवास से निकलेगी, जिसमें भाग लेने के लिए बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ जुटना शुरू हो गई है।


बैंड बाजा डीजे के साथ निकली बैकुंठी यात्रा-
संथारा शव यात्रा कार्यक्रम में हजारों की संख्या में लोग उमड़े। बैकुंठी यात्रा में ढोल नगाड़े, बैंड, डीजे के साथ लोग णमोकार मंत्र का जाप करते हुए मुक्तिधाम की ओर बढ़ें। इस यात्रा में ट्रैक्टरों पर भी जैन समाज के लोग भजनों के साथ बैकुंठी यात्रा के लिए रवाना हुए थे।
चंदन और पीपल की लकड़ी से दी गई मुखाग्नि-
पुखराज संकलेचा के पुत्रों सुशील,कांतिलाल ने चंदन और पीपल की लकड़ी से मुखाग्नि दी। इस दौरान पंचायत समिति प्रधान भगवत सिंह चौहान जसोल, सरपंच ईश्वर सिंह चौहान सहित कई जनप्रतिनिधि और लोग उपस्थित थे।
खास संयोग-
खास बात ये है कि घर का एक वरिष्ठ सदस्य संसार छोड़ गया और दूसरा उसी राह पर है, लेकिन माहौल शोक का होने के बजाय उत्सव का है। लोगों के चेहरे पर मायूसी नहीं, बल्कि भक्ति भाव है। जैन समाज में मान्यता है कि संथारापूर्वक देह त्यागने पर मनुष्य उत्तम गति को प्राप्त होता है। यही वजह है कि आज जसोल में संथारा के उत्सव की तैयारी है।
ये है दंपती के साथ संथारा लेने की पूरी कहानी-
गुलाबी देवी ने दस साल पहले जब उनकी दोहिती ने दीक्षा ली थी तभी तय कर लिया था कि दीक्षा के दस वर्ष पूरे होने पर संथारा लेंगी, लेकिन परिवार ने उन्हें संथारा लेने से रोका हुआ था। पुखराज का संथारा का कोई विचार नहीं था। इसी बीच गत 7 दिसंबर को पुखराज को हार्ट अटैक आ गया और उन्हें जोधपुर के निजी अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया, लेकिन कोई चमत्कार ही था कि वे 83 की उम्र में 16 दिसंबर को स्वस्थ होकर घर लौट आए।
घर लौटने पर परिवार ने उनका ढोल-नगाड़ों से भव्य स्वागत किया, लेकिन जीवन से विरक्ति हो चुकी थी। 27 दिसंबर को उन्होंने भोजन-दवा छोड़ दी और कहा मैं अब संथारा पर हूं। उन्हें सुमति मुनि के सान्निध्य में संथारा दिलाया गया। उनके पीछे-पीछे पत्नी गुलाबी देवी ने भी भोजन-पानी छोड़ दिया, लेकिन इसी दौरान तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य महाश्रमण आने वाले थे। सो उन्होंने तीसरे दिन पानी लेना शुरू कर दिया। 6 जनवरी को आचार्य महाश्रमण ने उन्हें संथारा ग्रहण करवाया।

