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देश की न्यायिक व्यवस्था में 22 सालों तक झूठी दलील- गवाही पर चले दहेज हत्या मामले का पढ़िए काला सच

देश की न्यायिक व्यवस्था में 22 सालों तक झूठी दलील- गवाही पर चले दहेज हत्या मामले का पढ़िए काला सच

यूएसए से अपने परिवार को न्याय दिलाने वाली आस्था राव ने कहा यह केस नहीं हमारी कानून व्यवस्था का खतरनाक चेहरा है जिस पर सभी को गंभीरता से सोचना पड़ेगा

रिपोर्टर भगवत शर्मा
दिव्यांग जगत न्यूज पेपर & चैनल

न्यायालय अतिरिक्त सेशन न्यायधीश, महिला उत्पीड़न प्रकरण, जयपुर के सुनाए निर्णय एवं 22 सालों के संघर्ष उपरांत मिली जीत को जोगिन्दर राव की पुत्री आस्था राव ने इस केस को राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय प्लेटफार्म पर सामाजिक सरोकार के दृष्टिकोण से चलाने का निर्णय लिया है। यूएसए से वीसी के माध्यम से पत्रकारों से रूबरू होते हुए आस्था राव ने कहा कि वह उन विषयों पर समाज कार्य करना चाहती है जिसकी जानकारी के अभाव में उनकी भाभी की आत्महत्या की घटना हुई। उसके बाद उनके परिवार को झूठे मुकदमों के चलते यातनाएं झेलनी पड़ी। अपने पिता को जेल की प्रताड़नाओं के बाद खो दिया। कैंसर से पीड़ित उम्रदराज माँ को भी जेल में रहना पड़ा और भाई डिप्रेसिव एग्जाइल में चला गया।
आस्था राव ने बताया कि इस घटना के समय वह 10वीं कक्षा में पढ़ती थी। 2009 में उन्होंने अपने पिता की मृत्यु उपरांत स्टिंग ऑपरेशन कर 22 साल तक कानून की लंबी लड़ाई लड़ते हुए अपने परिवार को बचाया। इस घटना ने उसके जीवन को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया है। इसलिए उसने तय किया है कि वह पिता के नाम से बनाए जुगनू क्लब के माध्यम से वह भारतीय परिवेश में युवतियों में अवसाद की समस्या पर कार्य करने की रूप रेखा तैयार कर आने वाले दिनों में बड़े स्तर पर अभियान की शुरूआत करने जा रहीं हैं। जिसकी शुरूआत हरियाणा के महेंद्रगढ़, रेवाड़ी, फरीदाबाद, रोहतक, कुरुक्षेत्र जिलों की बड़ी शिक्षण संस्थाओं में रैंडम सर्वे के तौर पर किया जाएगा। शुरू में ऑब्जर्वेटरी सर्वेक्षण करके उससे मिली जानकारी के आधार पर एक स्ट्रक्चर्ड प्रश्नावली तैयार की जाएगी। उसे शिक्षण संस्थानों में रिसर्च विषय का अध्ययन कर रहे विद्यार्थियों के सहयोग से भरवाया जायगा। इसमें बेहतर सहयोग करने वालों को प्रोत्साहित भी किया जाएगा। आस्था राव बताती हैं कि वह अपने परिवार की 22 सालों की बर्बादी और 2 जान चले जाने का मुख्य कारण अवसाद की बीमारी के विषय में अज्ञानता को भी मानती है। अपने पिता और भाभी को तो वापस नहीं ला सकती किंतु अन्य किसी परिवार की बेटी-बहु और पूरे परिवार को काल का ग्रास बनने से बचाने में अपना जुगनू प्रयास करना चाहती हैं।
प्रेस वीडियो कॉन्फ्रेंस में उपस्थित डॉ विजय भार्गव से आस्था राव ने अमरीका से ही अपनी भाभी के पत्रों एवं उनकी सहेली के लिखे पत्रों को समझ कर जाना कि यदि इन लक्षणों को पहले समझ लिया जाता तो भाभी रेणुका का इलाज जल्दी शुरू हो सकता था और बीमारी को बढ़ने से रोक सकते थे।

जब यह घटनाक्रम हुआ उस समय परिवार नारनौल में रहता था
जून 1999 में आस्था राव अपने पिता जोगिन्दर राव और माता विजय यादव संग नारनौल में ऑफिसर्स कॉलोनी में रहती थी। उनका भाई और भाभी जयपुर रहते थे। आस्था की भाभी ने आत्महत्या 16जून 1999 को जयपुर में कर ली थी। जयपुर वाले मकान मालकिन के कोर्ट के बयान से मिली जानकारी आस्था राव ने डॉ विजय भार्गवा से सांझा की। उनकी भाभी ने उनकी माँ के घर छोड़ते ही अपने आपको अकेले पाकर तुरंत आत्महत्या कर ली थी। मकान मालकिन सुनीता गोयल ने बयान में बताया कि वह नॉर्मली खुशी से रहती थी। अपनी मां को हंसते हुए सीओफ़ किया फिर ऊपर जाकर फांसी लगा ली। डॉ भार्गव ने बताया कि अवसाद वाली मानसिक बीमारी में कई बार रोगी अकेले रहने पर बढ़ते अवसाद के साथ कभी कभी आत्महत्या के विचार आने लगते हैं। आत्महत्या के विचार प्रयास में बदल जाते हैं। यह क्षणिक होते हैं। यह क्षण अगर टाल दें तो हो सकता है व्यक्ति आत्महत्या ना करे।

मनोचिकित्सकों ने इस केस की गहराई से स्टडी की तो सामने आया सच
जयपुर के प्रसिद्ध डॉ प्रमोद ढाका जो आस्था की भाभी का इलाज मृत्यु से तीन महीने पहले से कर रहे थे ने कोर्ट में अपना बयान दिया था। जिसकी स्टडी करते हुए डॉ. विजय भार्गव ने बताया कि अवसाद की बीमारी में दवाइयां का असर आने में कुछ समय लग जाता है। इस दौरान मरीज को निगरानी में ही रखना चाहिए। ऐसे केस में आत्महत्या का अंदेशा व्यक्त किया हो तो किसी भी सूरत में मरीज को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। आस्था की भाभी के शादी से पहले की उनकी सहेली ने अपने पत्र में रेणुका को दुखी नहीं रहने और खुश और चंचल बन जीवन को हसीन सपना समझ कर जीने की सलाह देने के लेख पर, डॉ भार्गव ने कहा कि कोई जीवन की किसी भी समय की घटना व्यक्ति के भीतर गहरा असर डाल के रह सकती है। कोर्ट में दस्तावेज के तौर पर जमा हुए इन पत्रों को भी आधार बनाते हुए पीठासीन अधिकारी रिद्धिमा शर्मा ने अपने निर्णय में भी इसे शामिल किया है। रेणुका के हस्तलिखित पत्र में लिखा है कि अचानक बहुत तेज बारिश शुरू हो गई और वह रोने लगी पर डॉ भार्गव का कहना है कि बारिश में प्राकृतिक रोशनी कम हो जाती है या अंधेरा हो जाता है। अवसाद का मरीज नकारात्मक विचारों से घिरा रहता है। अंधेरा भी नकारात्मक अवस्था का नाम है। बरसात में, सर्दियों में अंधेरा जल्दी हो जाता है इन दिनों में अवसाद बढ़ जाता है। लाल सिंह यादव पूर्व प्रिंसीपल जो जोगिन्दर कुमार के छठवीं कक्षा से मित्र हैं ने वार्ता का संचालन किया। बताया कि हर घर बेटी वाला भी है और बेटे वाला भी। दोनों ही पक्षों को अपने बच्चों के व्यवहार से उनके स्वभाव की जानकारी होती है। किसी भी पक्ष के बच्चे की समस्या को छुपाना नहीं चाहिए। छुपाने से समस्या बढ़ जाती है। प्रोफेसर (डॉ) बबिता पराशर ने बताया कि समाज को इस तरह के मामले सामने आने पर सभी पहुलओं को समझकर ही अपनी धारणा बनानी चाहिए। अवसाद को पागलपन के साथ जोड़ कर हम अपने समाज और मरीजों को मुश्किल में डाल रहे हैं। बचपन से ही हमें जीत और केवल जीत की चाहत को विकसित किया जाता है। हमें अपनी शिक्षा प्रणाली में हार को भी स्वीकारना सिखाना होगा।
आस्था राव द्वारा आयोजित वीपीसी में तथ्यों की विषेशज्ञों से जांच में यह निष्कर्ष निकाला कि अवसाद संबंधी जानकारी का अभाव, भाभी की मां जो उनकी अटेंडेंट थी द्वारा डॉक्टर की सलाह को गंभीरता से नहीं लेना और उन्हें अकेले छोड़ चले जाना, और फिर अवसाद को टैबू (संकीर्ण मानसिकता) की तरह समझ कर इससे पल्ला झाड़ लेना भी झूठा मुकदमा दर्ज होने के पीछे एक कारण है।समाज में इस बीमारी की जानकारी का अभाव तो मुख्य वजह है ही।

इसलिए जुगनू क्लब (जैतपुर) रेवाड़ी इस घटनाक्रम के सभी पहुलओं को सिलसिलेवार तरीके से समाज को जागरूक करने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाने जा रहा है ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं को रोका जा सके। प्रेस कांफ्रेस के बाद डॉ पूनम यादव (सर्जन) कलावती हास्पिटल्स ने अपने ऑडियो संदेश के जरिए अवसाद को स्वीकारने की हिम्मत लाने और डट कर इसे पछाड़ देने पर बल दिया। माहौल को हलका फुलका बनाने के लिए मंजुल भारद्वाज की जिंदगी को खूबसूरत बनाती रचना को बजाया गया। सभी की आंखें नम हो गई।

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