बुनियादी जरूरतें पूरी हो तो विकलांगता अभिशाप नहीं:जाटव
बुनियादी जरूरतें पूरी हो तो विकलांगता अभिशाप नहीं:जाटव
दिव्यांग अधिकार संघर्ष एवं न्याय हित मंच सदस्य दिनेश जाटव ने बताया कि हमारे देश में अक्सर विकलांगिता को अभिशाप का नाम दिया जाता है कि ये उनके पिछले जन्मों के पापों का दंड है। विकलांग कोई अभिशाप नहीं है, न ये आपके पूर्वजन्मों के पापों की सजा है न आपके परिवार को मिला कोई श्राप,वास्तविकता यह है कि इस दुनिया में कोई भी परिपूर्ण नहीं है,कोई न कोई कमी हर इंसान में मौजूद होती है, कुछ नजर आ जाती है तो कुछ छुपी रहती है, इसी तरह हर इंसान में कुछ न कुछ अलग काबिलियत भी होती है,अपनी कमियों को समझकर उस पर विजय पाना ही हर जिंदगी का लक्ष्य है, इंसान वही है जो अपनी खूबियों का पलड़ा भारी कर अपनी कमियों को पछाड़ देता है, और दिए हुए संदर्भों में खुद को मुक्कम्मल साबित करता है,पर ये भी सच है कि सामाजिक धारणाओं और संकुचित सोच के चलते शारीरिक विकलांगता के शिकार दिव्यांग भाई-बहनों को समाज में अपनी खुद की समस्याओं के आलावा भी बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है,लेकिन इस अभिशाप को एक वरदान में बदलने वाले लोगों से मै रूबरू हूं । हर रोज जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए नई-नई टेक्नाॅलाजी का इजात करते देश में विकलांग लोगों के लिए बुनियादी जरूरते ही मौजूद नहीं है और जहां भी मौजूद है वहां भी लोग उन जरूरतों का प्रयोग तक करने में सक्षम नहीं हो पातेअपने देश में विकलांग व्यक्ति अपनी विकलांगिता को भूलकर एक आम इंसान की तरह जिंदगी नहीं जी पा रहा है। सिर्फ इसलिए क्योंकि विकलांग व्यक्ति को उनके लिए आवश्यक बुनियादी जरूरतें मुहैया नहीं हो रही है। जिसे दो-चार परग चलने में भी सोचने पड़े उन दिव्यांग भाई-बहनों को अगर सीढ़ी नापनी पड़े तो उनकी गति क्या होगी। विकलांगों को बगैर सीढ़ी नापे साहब मिलगें ही नहीं। कारण साहब की ऊपर बैठने की मजबूरी है, विकलांगों को उनसे मिलने की। विकलांग विभाग यूं तो भूतल पर स्थापित है लेकिन उदयपुर जिला कल्याण विकलांग अधिकारी महोदय बैठते है द्वितीय तल पर। ऐसी बात नहीं है कि उन्हे बैठने के लिए कार्यालय में जगह नहीं है या वह नीचे बैठना नहीं चाहते लेकिन साहब को दूसरा प्रभार भी मिला हुआ है। सो ऊपर बैठना उनकी मजबूरी है, उनसे मिलना दिव्यांगों की । ऐसे में दो तलों की सीढ़ी चढ़ने में उन विकलांगों की क्या स्थिति होगी। सरकारी ऑफिसों कि स्थिति जहां विकलांगों के लिए रैम्प ना होने के चलते उन्हे कार्यालय में आने जाने में काफी तकलीफों का सामना करना पड़ता है। जब सरकारी ऑफिसों में ही विकलांगों के लिए बुनियादी जरूरतें मुहैया नहीं होती हैं तो बाकी जगहों की तो बात ही छोड दें।


